पूजा विधिसायंकाल के बाद और रात्रि आने से पूर्व का जो समय है उसे प्रदोष कहते हैं। व्रत करने वाले को उसी समय भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए। प्रदोष व्रत करने वाले को त्रयोदशी के दिन दिन भर भोजन नहीं करना चाहिए। शाम के समय जब सूर्यास्त में तीन घड़ी का समय शेष रह जाए तब स्नानादि कर्मों से निवृत्त होकर, श्वेत वस्त्र धारण करके तत्पश्चात् संध्या वन्दना करने के बाद शिवजी का पूजन प्रारम्भ करें।उद्यापन विधिप्रातः स्नानादि कार्य से निवृत्त होकर रंगीन वस्त्रो से मण्डप बनायें। फिर उस मण्डप में शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करके विधिवत पूजन करें तदनन्तर शिव-पार्वती के उद्देश्य से खीर से अग्नि में हवन करना चाहिए। हवन करते समय ॐ उमा सहित शिवाय नमः मन्त्र से 108 बार आहुति देनी चाहिए। इसी ॐ नमः शिवाय के उच्चारण से शंकर जी के निमित्त आहुति प्रदान करें। हवन के अन्त में ब्राह्मण को दान देना चाहिए।ब्राह्मणों की आज्ञा पाकर अपने बंधु बान्धवों को साथ लेकर भगवान् शंकर का स्मरण करते हुए व्रती को भोजन करना चाहिए। इस प्रकार उद्यापन करने से व्रती पुत्र-पौत्रादि से युक्त होता है तथा आरोग्य लाभ पाता हैं। ऐसा स्कन्द पुराण में कहा गया है।